पालक मंत्री के सामने फूटा जनप्रतिनिधियों का आक्रोश, जिला पंचायत सीईओ की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
सीधी। जिले के दौरे पर पहुंचे पालक मंत्री दिलीप जायसवाल के समक्ष जिला पंचायत सीईओ शैलेन्द्र सिंह सोलंकी की कार्यप्रणाली को लेकर जनप्रतिनिधियों की नाराजगी खुलकर सामने आई। डीएमएफ की बैठक के दौरान भी सीईओ की कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें दर्ज कराई गईं। जनप्रतिनिधियों ने जिला पंचायत अंतर्गत कराए जा रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, स्थल चयन और पंचायत स्तर पर प्रशासनिक निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जिला पंचायत के माध्यम से कराए गए कई निर्माण कार्य ऐसे स्थलों पर करा दिए गए, जहां उनकी उपयोगिता पर ही सवाल खड़े होते हैं। वहीं कुछ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता इतनी खराब होने की शिकायत सामने आई है कि वे पहली ही बरसात में जवाब देने लगे हैं। यदि शिकायतों में सच्चाई है तो यह न केवल निर्माण एजेंसियों की कार्यप्रणाली, बल्कि विकास कार्यों की निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सचिवों की पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार भी विवादों के घेरे में
जिला पंचायत में ग्राम पंचायत सचिवों की पदस्थापना और अतिरिक्त प्रभार को लेकर भी असंतोष बढ़ने की बात सामने आ रही है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मध्यप्रदेश की पंचायतराज व्यवस्था में सचिवों की पदस्थापना के लिए ग्राम पंचायत से जनपद पंचायत और उसके बाद जिला पंचायत स्तर तक प्रस्ताव भेजे जाने की प्रक्रिया निर्धारित है। इसके बावजूद कई मामलों में कथित तौर पर प्रस्तावों और प्राथमिकताओं को दरकिनार कर निर्णय लिए जाने की शिकायत की जा रही है।
आरोप यह भी है कि कुछ सचिवों को उनकी पसंद की ग्राम पंचायतों में अतिरिक्त प्रभार सौंपा जा रहा है, जबकि अन्य सचिवों को प्रभार से दूर रखा जा रहा है। इस कथित असमानता को लेकर पंचायत सचिवों के बीच भी असंतोष की स्थिति बनने की बात सामने आई है।
नियमों की अनदेखी हुई तो पंचायत व्यवस्था पर पड़ेगा सीधा असर
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि त्रिस्तरीय पंचायतराज व्यवस्था की मजबूती के लिए प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता, नियमों का पालन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका सुनिश्चित होना जरूरी है। यदि पंचायतों में सचिवों की पदस्थापना, निर्माण कार्यों की स्वीकृति और प्रशासनिक निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं होते हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण विकास योजनाओं और पंचायतों के कामकाज पर पड़ सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पालक मंत्री के समक्ष पहुंची इन शिकायतों पर शासन और जिला प्रशासन किस स्तर की जांच और कार्रवाई करता है। क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और सचिवों के प्रभार संबंधी निर्णयों की निष्पक्ष समीक्षा होगी, या शिकायतें भी अन्य मामलों की तरह फाइलों तक ही सीमित रह जाएंगी—इस पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं।
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