By Reporter
जिले के बिरसिंहपुर पाली के संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र में मानसून के बीच कराए जा रहे रंग-रोगन और फेंसिंग कार्य को लेकर सिविल विभाग के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर दया शंकर गंगेले की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। लाखों रुपये रुपये की लागत से कराए जा रहे इस कार्य की टाइमिंग और जरूरत को लेकर स्थानीय नागरिकों में नाराजगी दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि भारी बारिश के मौसम में जब कॉलोनी की मूलभूत समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है, तब सौंदर्यीकरण के नाम पर बड़े खर्च वाले कार्य कराए जा रहे हैं।
मानसून में पुताई, गुणवत्ता पर सवाल
आवासीय परिसर की बाउंड्री वॉल पर कराया जा रहा रंग-रोगन इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश और नमी के मौसम में बाहरी पुताई कराने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने की संभावना रहती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सिविल विभाग ने इस कार्य को मानसून के दौरान ही क्यों प्राथमिकता दी।
नागरिकों का आरोप है कि यदि यही कार्य मौसम खुलने के बाद कराया जाता तो न केवल रंग की गुणवत्ता बेहतर रहती बल्कि सरकारी राशि का भी अधिक प्रभावी उपयोग हो सकता था। लोगों ने मांग की है कि कार्य की तकनीकी स्वीकृति और समय चयन की समीक्षा की जानी चाहिए।
फेंसिंग बदलने को लेकर भी उठे सवाल
बाउंड्री वॉल पर लगी सुरक्षा फेंसिंग को बदलने का कार्य भी लोगों के निशाने पर है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि खराब हिस्सों की मरम्मत की जाती तो सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता था। पूरी फेंसिंग बदलने की आवश्यकता और इसके पीछे के तकनीकी आधार को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
लोगों का कहना है कि सार्वजनिक उपक्रमों में खर्च होने वाली राशि का उपयोग जरूरत और प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए। केवल कार्य पूरा करने के उद्देश्य से खर्च करना उचित नहीं है।
सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर की जिम्मेदारी पर चर्चा
सिविल विभाग के प्रमुख अधिकारी होने के नाते कार्यों की योजना, गुणवत्ता और निगरानी की जिम्मेदारी सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर दया शंकर गंगेले की मानी जाती है। ऐसे में मानसून के दौरान शुरू किए गए इस कार्य को लेकर अब उनकी भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़े बजट वाले कार्यों में पारदर्शिता जरूरी है। आखिर किस आधार पर बारिश के मौसम में यह कार्य स्वीकृत किया गया और इसकी आवश्यकता क्या थी, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
अधिकारियों की चुप्पी से बढ़ा संदेह
मामले में पक्ष जानने के लिए संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र के सिविल विभाग के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर दया शंकर गंगेले से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है।
अब स्थानीय नागरिकों और जागरूक लोगों ने मांग उठाई है कि लाखों रुपये के इस कार्य की आवश्यकता, गुणवत्ता, भुगतान प्रक्रिया और कार्य के समय की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। लोगों का कहना है कि सरकारी धन की सुरक्षा और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है। यदि कार्य नियमों के अनुरूप है तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके।