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ग्रामीण आजीविका, गो-वंश आधारित अर्थशास्त्र और पर्यावरणीय संतुलन के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक अभिनव सामाजिक पहल के तहत रविवार को बाल टोली'मोगली पलटन' द्वारा अपनी मासिक 'कछुआ चाल ३.०' साइकिल रैली के दूसरे चरण का आयोजन किया गया। तीन माह के रणनीतिक विश्राम के बाद जुलाई से पुनः प्रारंभ हुए इस अभियान का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में संधारणीय विकास (Sustainable Development) और रासायनिक-मुक्त कृषि के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ावा देना है।
'गाय है तो गाँव है' के केंद्रीय विषय पर आधारित यह रैली सुबह हनुमानगढ़ स्थित स्व० चन्द्रप्रताप तिवारी स्मारक स्थल से प्रारंभ होकर गाँव के प्रमुख मार्गों से गुज़रती हुई निर्धारित स्थल पर संपन्न हुई। आयोजन के दौरान बच्चों ने स्थानीय निवासियों के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरोद्धार और शहरी जन-स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभावों को लेकर संवाद स्थापित किया।
रसायन-मुक्त कृषि और शहरी स्वास्थ्य का संबंध
रैली में मोगली पलटन के प्रतिनिधियों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि गो-वंश आधारित मॉडल केवल एक पारंपरिक अवधारणा नहीं, बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की तात्कालिक आवश्यकताओं से जुड़ा एक व्यावहारिक समाधान है। बच्चों ने रेखांकित किया कि कृषि में गोबर और गौमूत्र आधारित जैविक इनपुट के बढ़ते प्रयोग से न केवल किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता और उत्पादन लागत कम होगी, बल्कि यह भूमि की उर्वरता को भी दीर्घकाल तक बनाए रखेगा।
कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत वैचारिक पक्ष के अनुसार, ग्रामीण स्तर पर उत्पादित रसायन-मुक्त खाद्यान्न, दुग्ध उत्पाद और प्राकृतिक सामग्री जब शहरी बाज़ारों तक पहुँचेंगे, तो वे शहरों में तेज़ी से बढ़ रही जीवनशैली संबंधी बीमारियों (Lifestyle Diseases) को नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होंगे। इस प्रकार, ग्रामीण आत्मनिर्भरता सीधे तौर पर शहरी स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ती है।
'गाय की चिट्ठी': मूक पशु के दृष्टिकोण से संवाद
अभियान की पूर्व परिपाटी को जारी रखते हुए इस बार भी बाल टोली द्वारा ग्रामीणों के मध्य 'गाय की चिट्ठी' का वितरण किया गया। इस पत्र के माध्यम से आयोजकों ने 'पर्सपेक्टिव टेकिंग' (Perspective-taking) की अवधारणा का प्रयोग करते हुए समाज और गौ-वंश के बीच के सदियों पुराने संबंधों को गाय के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास किया। पत्र का मुख्य उद्देश्य केवल भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करना नहीं, बल्कि पशु कल्याण और मानव समाज के बीच संधारणीय सह-अस्तित्व के महत्त्व को रेखांकित करना था।
कछुआ चाल' और सतत विकास का सिद्धांत
बाल टोली ने 'कछुआ चाल' नामकरण की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह विचार अनियंत्रित और तीव्र विकास की अंधी दौड़ के विपरीत संयमित, स्थिर और प्रकृति-अनुकूल प्रगति का समर्थन करता है। बाल टोली का मत है कि पारिस्थितिक तंत्र की पुनरुद्धार क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया विकास ही आने वाली पीढ़ियों के लिए टिकाऊ हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि 'कछुआ चाल ३.०' के तहत जुलाई 2026 से मार्च 2027 के मध्य कुल नौ मासिक रैलियों के आयोजन की योजना है, जो प्रत्येक माह के दूसरे रविवार को आयोजित की जाती हैं। आयोजकों के अनुसार, सितंबर माह में आयोजित होने वाले अगले चरण में स्थानीय युवाओं को इस वैचारिक अभियान से जोड़ने के लिए विशेष कार्ययोजना लागू की जाएगी।