₹65 हजार की सरकारी तनख्वाह… और स्कूल में पढ़ा रही थी ₹4,500 की ‘निजी शिक्षिका’! मुरैना के सरकारी स्कूल से उठे गंभीर सवाल

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति, जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि जिले के एक सरकारी स्कूल में पदस्थ प्रधानाध्यापक, जिन्हें करीब ₹65 हजार प्रतिमाह वेतन मिलता है
Raju Gupta (state head)

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Bhopal | Updated: 09 Aug 2026, 05:24 PM IST | 1 min read
₹65 हजार की सरकारी तनख्वाह… और स्कूल में पढ़ा रही थी ₹4,500 की ‘निजी शिक्षिका’! मुरैना के सरकारी स्कूल से उठे गंभीर सवाल
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 ₹65 हजार की सरकारी तनख्वाह… और स्कूल में पढ़ा रही थी ₹4,500 की ‘निजी शिक्षिका’! मुरैना के सरकारी स्कूल से उठे गंभीर सवाल

 मध्य प्रदेश सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति, जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि जिले के एक सरकारी स्कूल में पदस्थ प्रधानाध्यापक, जिन्हें करीब ₹65 हजार प्रतिमाह वेतन मिलता है, वे नियमित रूप से स्कूल में उपस्थित नहीं होते थे और इसके बावजूद सरकारी वेतन प्राप्त कर रहे थे।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी कथित तौर पर महज ₹4,500 प्रतिमाह पर एक युवती को सौंप दी गई थी। बताया जा रहा है कि वह युवती करीब ₹150 प्रतिदिन के हिसाब से स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ाती थी।

 सरकारी शिक्षक की जगह निजी तौर पर रखी गई युवती?

यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला सिर्फ शिक्षक की गैरहाजिरी तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आखिर एक सरकारी स्कूल में किसी बाहरी व्यक्ति से बच्चों को पढ़ाने का काम किस आधार पर कराया जा रहा था?

 बच्चों की पढ़ाई से खिलवाड़ तो नहीं?

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था पहले से ही संसाधनों, शिक्षकों की उपलब्धता और नियमित निगरानी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में यदि नियुक्त शिक्षक की गैरमौजूदगी में बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा किसी अन्य व्यक्ति के भरोसे छोड़ दिया गया, तो इसका सीधा असर छात्रों की शैक्षणिक गुणवत्ता और भविष्य पर पड़ सकता है।

अब जांच के घेरे में कई सवाल

- प्रधानाध्यापक की स्कूल में उपस्थिति कितनी नियमित थी?

- युवती को स्कूल में पढ़ाने की अनुमति किसने दी?

- ₹4,500 का भुगतान किसके द्वारा और किस आधार पर किया जा रहा था?

- स्कूल की उपस्थिति और निरीक्षण व्यवस्था पर निगरानी कौन रख रहा था?

- क्या संबंधित अधिकारियों को इस व्यवस्था की जानकारी थी?

अब निगाहें शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई के साथ-साथ यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है।

आपकी क्या राय है? क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति की निगरानी के लिए और सख्त व्यवस्था होनी चाहिए? कमेंट करके बताइए।

 

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